बिही के फायदे और नुकसान | Bihee ke fayde | health benefits of Quince in hindi

बिही भारत में पश्चिमी हिमालय में 1700 मी की ऊँचाई तक प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त काश्मीर, पंजाब, उत्तरी पश्चिमी भारत एवं नीलगिरी में इसकी खेती की जाती है। इसके फल के बीजों को बिहीदाना कहते हैं। बीजों को जल में भिगोने से फूल कर लुआबदार हो जाते हैं।

बिही के फायदे और नुकसान | Bihee ke fayde | health benefits of Quince in hindi
Bihee ke fayde

बिही के फायदे और नुकसान | Bihee ke fayde | health benefits of Quince in hindi

बिही परिचय :- यह भारत में पश्चिमी हिमालय में 1700 मी की ऊँचाई तक प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त काश्मीर, पंजाब, उत्तरी पश्चिमी भारत एवं नीलगिरी में इसकी खेती की जाती है। इसके फल के बीजों को बिहीदाना कहते हैं। बीजों को जल में भिगोने से फूल कर लुआबदार हो जाते हैं।

यह शाखा-प्रशाखायुक्त मध्यम आकार का छोटा वृक्ष होता है। इस वृक्ष के काण्ड की छाल गहरे भूरे वर्ण या काली रंग की तथा शाखाएं टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं। इसके पत्र सरल, 5-10 सेमी लम्बे एवं 3.8-7.5 सेमी चौड़े, अण्डाकार, गहरे हरे, ऊपरी भाग पर चिकने, नीचे अधोभाग पर भूरे तथा रोमश होते हैं। इसके पुष्प पत्रकोण से निकले हुए लगभग 5 सेमी व्यास के, श्वेत अथवा गुलाबी रंग की आभा से युक्त होते हैं। इसके फल नाशपाती आकार के, लगभग गोलाकार, अनेक बीजयुक्त तथा पकने पर सुगन्धित व सुनहरे पीले रंग के होते हैं। बीज लम्बगोल, चपटे तथा रक्ताभ-भूरे रंग के होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल फरवरी से जुलाई तक होता है।

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बिही क्या है (What is Quince?)

(Quince )बिही के वृक्ष तरुणीकुल के मध्यमाकार वाले होते हैं। अमेरिका तथा यूरोप में इसके वृक्ष प्रचुर संख्या में होते हैं। भारत में काश्मीर-पंजाब में पर्वतों पर यह लगाये जाते हैं। इसके फलों तथा बीजों का आयात काबुल और ईरान से होता है। इसे काश्मीरी नाशपाती भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे क्विन्स तथा लैटिन में साइडोनिया आबलोंगा कहते हैं।

बिही का फल कैसा होता है ?

इसके फल रूप रेखा में सेब की तरह होते हैं सुनहले रंग के सरस सुगन्धित तथा ऊपरी भाग में कठिन रोमश होते हैं। फल के भीतर पांच विभाग होते हैं। जिनमें प्रत्येक विभाग में दो लम्बी कतारों में अनेक बीज होते हैं। ये बीज लम्बे, गोल, चपटे, रक्ताभ भूरे रंग के होते हैं। इन्हीं बीजों को बिहीदाना कहते हैं। इन्हें जल में भिगोने से ये फूलकर लुआबदार हो जाते हैं। इसके पके फल खाये जाते हैं। फल तथा बीजों का उपयोग ओषधि के रूप में होता है। रसभेद से ये फल दो प्रकार के होते हैं। प्रायः ये फल खट्टे या खट-मीठे होते हैं। किन्तु ईरान आदि कुछ क्षेत्रों में लगाई गई जातियों में मीठे फल लगते हैं।

अनेक भाषाओं में बिही के नाम (Quince Called in Different Languages)

  • हिंदी :– बिही, बिहिदाना, गुरूप्रिया, बिपुलबीज,बही, काश्मीरी नाशपाती ;

  • संस्कृत नाम :– सिंचितका, अमृतफल

  • English :– Quince (क्विन्स)

  • Scientific Names :– साइडोनिया ऑब्लौंगा (Cydonia oblonga)

  • उर्दू :– बिही (Bihi);

  • कन्नड़ :– बमशुतु (Bamshutu), सिमेडे-लिम्बे (Simede limbe); 

  • गुजराती :– मोगलाइ बेंदाण (Moglai bendan);

  • तमिल :– सिमाईमथला (Shimaimathala);

  • तेलुगु :– सिमडानिम्मा (Shimadanimma);

  • बंगाली :– बिही (Bihi);

  • नेपाली :– बेही (Behi)

  • अरबी :– बिहीतुर्ष (Bihitursh), सफरज (Safarjae);

  • फारसी :– बिही (Bihi)

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बिही  के द्रव्यगुण :–

  • रस (taste on tongue):- मधुर, कषाय

  • गुण (Pharmacological Action): - गुरु

  • वीर्य (Potency): - शीत

  • विपाक (transformed state after digestion):- मधुर

प्रोटीन, वसा कार्बोहाइड्रेट खनिज द्रव्य, मेलिक एसिड (सेवाम्ल) तथा विटामिन सी होता है। आर्द्रता प्रायः 85 प्रतिशत होती है। बीजों में एमिग्डेलिन नामक ग्लाइकोसाइड, टेनिन, म्युसिलेज, अम्ल तथा तैल होता है।

बिही के गुण : Properties of Quince

  • बिही के बीज पिच्छिल, बलकारक, वृष्य, दाह तथा मूत्रकृच्छ्र शामक, मधुर, कषाय, शीत तथा गुरु होते हैं।

  • इसकी छाल ग्राही होती है।

  • इसके बीज हृदय एवं शरीर के लिए बलकारक, अतिसार रोधी, प्रवहिकारोधी तथा वृष्य होते हैं।

  • इसके फल बलकारक, ग्राही, व्रणरोपक, ज्वरहर, कफ निसारक, मस्तिष्क एवं यकृत् के लिए बलकारक, दीपन, तृष्णाहर तथा श्वासहर होते हैं।

  • इसमें प्रवाहिकारोधी गुण पाया जाता है।

बिही से विभिन्न रोगों का सफल उपचार : Quince benefits and Uses (labh) in Hindi

1-- दुर्बलता  :-  बिहीदाना के बीजों को कर्म पानी में डालने से बना लुआब 20-40 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से दुर्बलता मिट जाती है।

2- मुंह में पानी आना :-   500 मि.ग्रा. बिहीदाना मुंह में रखकर दिन में 2-3 बार चूसने से मुंह में बार-बार पानी आना ठीक हो जाता है।

3- गला सूखना :-   3 ग्राम बिहीदाना को 200 मि.ली. पानी में एक घण्टे तक भिगो दें। उसके बाद इसको उसी पानी में मसलकर छान लें। इस पानी में चीनी मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बार-बार गला सूखना बन्द हो जाता है।

4- प्रदर में बिही का उपयोग लाभदायक :-  बीज 10 ग्राम को रात भर पानी में भिगोकर सुबह उसमें 15 ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करने से रक्त प्रदर, रक्तातिसार, प्रमेह, मूत्राघात आदि बहुत से रोगों का शमन होता है। यह बार-बार प्यास लगने और जलन में भी हितकारक कहा गया है।

5- पेचिश में लाभकारी है बिही का सेवन  :-  बिही बीज और ईसबगोल की भूसी को 3-3 ग्राम लेकर पानी में भिगोकर इसमें शक्कर मिलाकर सेवन करें।

6- सर्दी-जुकाम मिटाए बिही का उपयोग  :-  बीजों के लुआब में एक चम्मच अदरक का रस मिलाकर सेवन करायें। यह जुकाम में लाभ करता है।

7- बिही के प्रयोग से दूर करे सूखी खांसी  :-  बिहीदानों के लुआब में मिश्री मिलाकर थोड़ा-थोड़ा दिन में चार-पांच बार पिलाने से सूखी खांसी का वेग रुकता है।

8- आंतों का घाव ठीक करने में बिही फायदेमंद  :-  बिहीदानों का लुआब पिलाने से आंतों का घाव जल्दी ठीक हो जाता है। यह लुआब ईसबगोल लुआब की तरह आंतों की झिल्ली पर लिपट जाती है। इससे बिना किसी तकलीफ के आंत्र के घावशीघ्र ठीक हो जाते हैं।

9-सुजाक रोग में बिही के प्रयोग से लाभ  :-  बिहीदानों को गर्म पानी में कुछ देर रखकर फिर पानी को छानकर पिलाने से पेशाब की जलन शान्त होकर पेशाब खुलकर लगता है और सुजाक धीरे-धीरे अच्छा हो जाता है।

10-आग से जलने पर बिही के इस्तेमाल से लाभ  :-  आधा लीटर पानी में 15 ग्राम बिहीदाने मिलाकर उनका लुआब निकालकर आग से जले स्थान पर इसका लेप करने से जलन मिटती है और फफोले भी नहीं पड़ते हैं।

11- दस्त में बिही के इस्तेमाल से फायदा  :-  बिहीदानों का काढ़ा बनाकर देने से लाभ होता है।

12- आन्त्र का सूखापन दूर करने में बिही का उपयोग फायदेमंद  :-  आंतों की खुश्की को दूर करने के लिये बिही के बीजों को जल में भिगोकर लुआब (चिपचिपा गाढ़ा रस) निकालकर उसमें मिश्री मिलाकर पिलाते हैं।

13- मुँह के छाले मिटाए बिही का उपयोग  :-  बिहीदाना (बिही के बीज) के लुआब (चिपचिपा गाढ़ा रस) से कुल्ला करने से मुखपाक ठीक होता है।

बिही के सेवन की मात्रा (How Much to Consume Quince?)

इसके बीज (बिहीदाना) की उपयुक्त मात्रा 3 से 5 ग्राम है।

बिही से निर्मित विशिष्ट योग  :–

शर्बत बिही निर्माण विधि और फायदे

बिही खटमीठी के छिलके और दाने दूर कर एक लीटर रस निकालकर उसमें 3 किलो ग्राम शक्कर मिलाकर पकायें। शर्बत की चाशनी हो जाने पर उतार कर रख लें। मात्रा 25 से 50 मिली. तक पानी में मिलाकर पिलाने से वमन और अतिसार रोगों में लाभ होता है। यह शर्बत आमाशय और हृदय को बल प्रदान करता है।

मुरब्बा बिही निर्माण विधि और फायदे

बिही के छिलके हटाकर आंवलों के मुरब्बे की तरह मुरब्बा तैयार कर लें यह मुरब्बा अजीर्ण और अतिसार में लाभप्रद है। यह भी हृदय और दिमाग को बल देने वाला है।

बिही बीज कल्प निर्माण विधि और फायदे

प्रारम्भ में इसके सात बीजों को कूटकर रात के समय 60 मिली. जल में कांच के पात्र में भिगोकर प्रात: उसमें 125 मिली. गरम किया हुआ दूध और 30 ग्राम मिश्री मिलाकर अच्छी तरह धीरे-धीरे चबाते हुए सेवन करें। इसी प्रकार सुबह भिगोकर रात में सेवन करें। दस दिनों तक यही क्रम लें। इसके बाद दो बीजों को और बढ़ायें तथा इसी क्रम से दस दिनों तक चालू रखें। इस प्रकार तीन महीनों तक बीजों की वृद्धि क्रम से बढ़ायें। बीजों की संख्या 24 तक हो जाने पर कुछ दिनों तक उसी संख्या में लेते रहें। बीजों के वृद्धि क्रम के साथ ही साथ जल, दूध और मिश्री को भी बढ़ायें इसके बाद घटाते हुए सात बीजों पर आ जायें। इस कल्प प्रयोग से अफारा, अरुचि, मन्दाग्नि, हिचकी, पेट दर्द, जलन, कब्ज, थकान, अनिद्रा, विस्मृति, वीर्य की दुर्बलता आदि बहुत से रोग धीरे-धीरे समाप्त होते हैं।

इस प्रकार वात पित्त रोगों से बचे रहने के लिये तथा शरीर को पुष्ट बनाये रखने के लिये बिही का सेवन उपयोगी है। बल-वीर्य की वृद्धि के लिये, जलन को मिटाने के लिये इसके बीजों को उपयोग में लाना लाभदायक है। बहुत से पौष्टिक प्रयोगों में ये बीज उपयोग में लाये जाते रहे हैं। इसका प्रयोग पेचिश, अतिसार, प्रदर, प्रतिश्याय, कास आदि में भी उपयोगी पाया गया है।

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बिही के नुकसान (Side Effects of Quince) :–

अधिक मात्रा में बिही के फल खाने से हिचकी, कम्पवात, खांसी, पेट का दर्द आदि शिकायतें हो जाने की संभावना रहती है। इसके हानिकारक प्रभाव को शहद दूर कर देता है।

बिही के बीजों की उपयुक्त मात्रा 3 से 5 ग्राम है। इसकी अधिक मात्रा आमाशय को दुर्बल बनाती है। चीनी और सोंफ का सेवन बीजों के हानिकारक प्रभाव को समाप्त करते हैं।

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बिही कहाँ पे पाया या उगाया जाता है (Where is Quince Found or Grown?)

यह भारत में पश्चिमी हिमालय में 1700 मी की ऊँचाई तक प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त काश्मीर, पंजाब, उत्तरी पश्चिमी भारत एवं नीलगिरी में इसकी खेती की जाती है।

ध्यान दें :- Dcgyan.com के इस लेख (आर्टिकल) में आपको बिही के फायदे, प्रयोग, खुराक और नुकसान के विषय में जानकारी दी गई है,यह केवल जानकारी मात्र है | किसी व्यक्ति विशेष के उपयोग करने से पहले चिकित्सक से परामर्श करना आवश्यक है |

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